कौन हैं लिंगायत? (Who are Lingayats?) : डेली करेंट अफेयर्स

कर्नाटक का लिंगायत समुदाय एक बार फिर से चर्चा में है। वैसे तो पिछले कुछ वक्त से राजनीति में इसकी धमक काफी बनी हुई है, लेकिन इस बार यह चर्चा एक नकारात्मक वजह से है।

चर्चा में क्यों?

कर्नाटक के लिंगायत स्वामियों में से एक डॉ. शिवमूर्ति मुरुगा शरणरु के खिलाफ दो नाबालिग लड़कियों के कथित यौन शोषण का मामला दर्ज किया गया है। इसके अलावा, उन पर अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निरोधक कानून के प्रावधानों के उल्लंघन का भी आरोप है। बता दें कि डॉ. शिवमूर्ति मुरुगा शरणरु मुरुगा मठ से संबंधित हैं। मुरुगा मठ उन मठों में से एक है जो समाज सुधारक संत भगवान बसवेश्वर के सुधारवादी आंदोलन के बताए मार्गों पर चलता है।

कौन हैं लिंगायत?

लिंगायत एक धार्मिक समुदाय है जो 12वीं सदी के समाज सुधारक वासवन्ना के अनुयायी हैं। दरअसल कर्नाटक में हिंदुओं के मुख्यत: पांच संप्रदाय माने जाते हैं जिन्हें शैव, वैष्णव, शाक्त, वैदिक और स्मार्त के नाम से जाना जाता है। इन्हीं में एक शैव संप्रदाय के कई उप संप्रदाय है उसमें से एक है वीरशैव संप्रदाय। लिंगायत इसी वीरशैव संप्रदाय का हिस्सा हैं। शैव संप्रदाय से जुड़े अन्य संप्रदाय शाक्त, नाथ, दसनामी, माहेश्वर, पाशुपत, कालदमन, कश्मीरी शैव और कापालिक आदि नामों से जाने जाते हैं।

वीरेशैवा पंथ की शुरुआत जगत गुरू रेनुकाचार्य ने की। उन्होंने पांच पीठों की स्थापना की जैसे कि आदि शंकराचार्य ने की थी। इन पांच पीठों में से सबसे महत्वपूर्ण मठ चिकमंगलूर का रंभापूरी मठ है। इतिहासकार बताते हैं कि वीरेशैवा पंथ काफ़ी प्राचीन है और वैदिक धर्मों में से एक है। अब हुआ यूं कि 12वीं शताब्दी में बस्वाचार्य का उदय हुआ जो इन्हीं जगतगुरु रेनुकाचार्य के अनुयायी थे। अपने गुरु की विचारधाराओं से थोड़ा अलग, बस्वाचार्य यानी बासवन्ना ने सनातन धर्म के विकल्प में एक अलग पंथ खड़ा किया जिसमें निराकार शिव की कल्पना की गई थी। बासवन्ना ने जाति और लिंग भेद का पुरजोर विरोध किया और अपने उपदेशों में काम को ही पूजा बताया। इन्होंने कल्याणी चालुक्य अथवा कलचुरी चालुक्य शासन के दौरान प्रशासन में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। राजा विज्जल तृतीय के शासन के दौरान इन्होंने कलचुरियों को अपनी सेवाएं दीं थी। इन्होंने शिव केंद्रित भक्ति आंदोलन को कर्नाटक में नई दिशा दी और इनके अनुयायियों को लिंगायत कहा जाता है।

वीरशैव और लिंगायतों में क्या अंतर है?

ज़्यादातर लोग मानते हैं कि वीरशैव तथा लिंगायत एक ही है, हालाँकि लिंगायतों का तर्क है कि वीरशैव का अस्तित्व लिंगायतों से पहले का है तथा वीरशैव मूर्तिपूजक होते हैं। वीरशैव वैदिक अनुष्ठानों का पालन करते हैं, जबकि लिंगायत ऐसा नहीं करते। लिंगायतों में जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि कर्म के आधार पर वर्गीकरण की पैरवी की जाती है। लिंगायत मृतकों को जलाने की बजाय दफनाते हैं और श्राद्ध नियमों का पालन नहीं करते, न तो ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था को मानते हैं और न ही पुनर्जन्म को। इन्होंने मूर्ति पूजा का भी विरोध किया। जहां वीरेशैवा पंथ को मानने वाले जनेऊ धारण करते हैं। लिंगायत जनेऊ धारण तो नहीं करते हैं, लेकिन इष्ट शिवलिंग को अपनाते हैं। उसे धारण करते हैं और उसकी उपासना करते हैं। वीरेशैवा वेद और पुरानों पर आस्था रखते हैं लिंगायत बासवन्ना के 'शरण' यानी वचनों पर चलते हैं जो संस्कृत में नहीं बल्कि स्थानीय भाषा कन्नड़ में हैं।

लिंगायतों की मांग क्या है?

लिंगायतों का मानना है कि वो हिंदू नहीं हैं, क्योंकि उनका पूजा करने का तरीका हिंदुओं से बिलकुल अलग है। वो निराकार शिव की आराधना करते हैं। वो मंदिर नहीं जाते और ना ही मूर्ति की पूजा करते हैं। इसलिए उन्हें हिंदू धर्म से अलग धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाए। अब अगर इन्हें धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक का दर्जा मिल जाता है तो इन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण का फायदा मिलेगा।

इनको लेकर राजनीति किस तरह की चल रही है?

कर्नाटक की कुल आबादी में लिंगायत तकरीबन 17 फीसदी हैं। सभी राजनीतिक पार्टियां इनके वोट बैंक को अपने पक्ष में करना चाहती हैं। इसलिए जब-जब चुनाव आता है तो राजनीतिक पार्टियां इनके पक्ष में कुछ न कुछ आश्वासन जरूर देती हैं। कुछ समय पहले कांग्रेस की सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म के रूप में मान्यता देने का प्रस्ताव पारित किया था। प्रस्ताव पारित करके इस मामले को केंद्र सरकार के समक्ष भेज दिया गया है। बीजेपी शासित केंद्र सरकार के सामने दुविधा यह है कि अगर वो राज्य सरकार के प्रस्ताव को ख़ारिज कर देती है तो उसे लिंगायतों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। अगर प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी जाती है तो इसका श्रेय लेने की कोशिश कांग्रेस करेगी।