कुर्की क्या है? (What is Kurki?) : डेली करेंट अफेयर्स

किसानों की खुदकुशी का मसला आए दिन सुर्खियों में रहता है। कारण कुछ भी हो, लेकिन इस कारण का मूल लगभग हर मामले में एक जैसा होता है और वह है कर्ज का जंजाल। इस जंजाल में उलझ कर किसान छटपटा कर जिंदगी की जंग हार जाता है। पंजाब में एक ऐसा ही मामला एक बार फिर से चर्चा में हैं और वजह है कुर्की … जिसकी जड़ें कर्ज के बोझ से जाकर ही जुड़ती हैं।

क्या है पूरा मामला?

पंजाब के एक किसान थे जिनका नाम था बलविंदर सिंह। बलविंदर सिंह ने खेती के लिए अपनी जमीन की गारंटी पर एक स्थानीय साहूकार से लोन ले रखा था। अब हुआ यूं कि पिछले साल उनकी फसल बर्बाद हो गई और उनके पास कर्ज लौटाने के पैसे नहीं रह गए। उधर साहूकार ने उनके खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर कर दिया और अदालत ने बलविंदर सिंह के जमीन की कुर्की की आदेश जारी कर दी। बदले में बलविंदर सिंह डीसी ऑफिस के सामने धरने पर बैठ गए कि उन्हें उनके फसल बर्बाद होने के बदले मुआवजा दिया जाए, ताकि वे अपना कर्ज वापस कर पाएं और यह कुर्की रोकी जा सके। इसी प्रक्रिया में बलविंदर ने खुदकुशी कर ली। ध्यान दीजिएगा कि एक किसान के लिए उसकी जमीन से बढ़कर उसकी और कोई थाती नहीं होती।

कुर्की होती क्या है?

जब किसी व्यक्ति अथवा संस्था को लोन की जरुरत होती है तो उस लोन के बदले उसे अपनी कोई संपत्ति या जमीन गिरवी रखनी पड़ती है। किसानों के पास सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति उनकी जमीन होती है तो इसलिए वे अपनी जमीन ही गिरवी रखते हैं। इसका उद्देश्य यह होता है कि अगर वह व्यक्ति अथवा संस्था लोन को वापस चुकाने में फेल हो जाती है तो उसकी ज़मीन या संपत्ति को बेच करके लोन की रकम की वसूली की जा सके। लोन देने का काम ना केवल बैंक बल्कि वैध-अवैध रूप से साहूकार, कमीशन एजेंट और प्राइवेट कंपनियां भी करती हैं। चूँकि किसान लोन के बदले अपनी जमीन को लेकर लिखित मंजूरी दे चुका होता है, इसलिए कर्ज़ न चुका पाने की स्थिति में लोन देने वाली संस्थाएं या साहूकार आदि किसानों की जमीनों की कुर्की कर लेते हैं।

इस कुर्की की प्रक्रिया क्या होती है?

कुर्की का ज़िक्र सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) 1908 की धारा 60 में की गई है और इसी के तहत इसकी प्रक्रिया पूरी की जाती है। प्रक्रिया तब शुरू होती है जब किसान लोन नहीं चुका पाता है और साहूकार कुर्की का ऑर्डर लेने के लिए अदालत का रुख करता है। दरअसल इसमें होता क्या है कि किसान द्वारा बैंक या साहूकार को जो जमीन गिरवी रखी जाती है, वह बैंक या साहूकार के नाम पर रजिस्टर्ड हो जाती है। कुछ मामलों में जमीन की नीलामी भी की जाती है। इतना ही नहीं, CPC की इस धारा 60 के तहत किसान की जमीन के साथ-साथ उसके कृषि उपकरणों की भी कुर्की की जा सकती है।

क्या सच में पंजाब में कुर्की प्रतिबंधित है?

पिछले कुछ सालों से पंजाब में जिन-जिन राजनीतिक दलों का शासन रहा है उन्होंने यह दावा किया कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कुर्की पर प्रतिबंध लगाया है। उदाहरण के तौर पर साल 2017 के विधानसभा चुनाव में एक राजनीतिक पार्टी ने 'करजा कुर्की खातम, फसल दी पूरी रकम' के नारे पर ही चुनाव लड़ा था। चुनाव जीतने के बाद इस पार्टी की सरकार बनी और इसने पंजाब सहकारी समिति अधिनियम की धारा 67-A को समाप्त कर दिया। बता दें कि पंजाब सहकारी समिति अधिनियम की धारा 67-A के जरिए सहकारी समितियां किसानों की जमीनों की नीलामी करती थीं और लोन वसूली के लिए इस प्रक्रिया का सहारा लिया जाता था। वहीं किसानों के मुताबिक जमीन की कुर्की को रोकने के लिए अधिनियम की धारा 63-B, 63-C को नहीं हटाया गया है। यानी नीलामी की प्रक्रिया बदली है कुर्की की नहीं।

इसी तरह से एक अन्य पार्टी की सरकार ने दावा किया है कि उन्होंने कुर्की को खत्म कर दिया था, जबकि किसान संगठनों का कहना है कि सरकारें नीलामी और कुर्की पर स्पष्ट आदेश जारी ही नहीं करती हैं। ऐसे में किसान लगातार इस कुर्की के जाल में उलझ के पड़े हुए हैं।

जब इतनी समस्या है तो इस कुर्की को प्रतिबंधित क्यों नहीं कर दिया जाता?

सीपीसी 1908 की धारा 60 लगभग 110 साल से भी ज्यादा पुरानी है। अंग्रेजों के जमाने में बना यह कानून आज भी इस्तेमाल में लाया जा रहा है। किसानों के लिए जानलेवा बन चुके इस कानून में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। पंजाब में तो स्थिति और भी खराब हो गई है और वहां पर इसको प्रतिबंधित करने की मांग अक्सर की जाने लगी है। साल 2018 में इस बारे में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में एक याचिका दायर करके इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। वहीं दूसरी तरफ पंजाब सरकार एक हलफनामें में कह चुकी है कि कुर्की पर प्रतिबंध लगाने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि किसानों को कर्ज माफी और मुआवजे जैसे कदमों के जरिए राहत दी जा रही है।

आखिर किसान इन साहूकारों के चंगुल में फंस कैसे जाते हैं?

दरअसल किसानों को साहूकारों द्वारा लोन के लिए पोस्ट-डेटेड चेक देने के लिए कहा जाता है। पोस्ट-डेटेड का मतलब हुआ कि अपने लोन की वसूली के लिए साहूकार भविष्य में किसान के खाते से पैसा निकाल पाएंगे। अब अगर किसान समय पर लोन वापस नहीं कर पाया तो साहूकार इस चेक का इस्तेमाल चेक बाउंस के मामलों में गिरफ्तारी आदेश जारी कराने के लिए करते हैं। इसके अलावा, साहूकार कुर्की के पहले से ही सारे दस्तावेजों पर बड़ी ही चालाकी से हस्ताक्षर करा लेते हैं और किसानों पर दबाव बनाकर सारे कागजात उनसे ले लेते हैं। अब चूँकि कुर्की पर प्रतिबन्ध के सम्बन्ध में कोई स्पष्ट आदेश तो है नहीं तो साहूकार क़ानूनी मकड़जाल का फायदा उठाकर इस सम्बन्ध में आदेश जारी करा लेता है।

सरकारें आखिर इस पर स्पष्ट आदेश जारी क्यों नहीं करतीं?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2022 में, सहकारी समितियों और पंजाब कृषि विकास बैंकों को लोन का भुगतान न करने के लिए किसानों के खिलाफ 2,000 से अधिक गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए थे। इसके अलावा, सहकारी समितियों और पंजाब कृषि विकास बैंकों में किसानों के नाम पर 3,200 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज है। इनमे से 60 फीसदी से ज्यादा किसान पिछले तीन सालों से एक भी पैसा वापस नहीं कर पाए हैं। ऐसे में कुर्की प्रक्रिया को सीधे-सीधे खत्म करने से सरकारों को भारी नुकसान होगा और इसीलिए सरकारें इससे कतरा रही हैं।

आगे क्या किया जा सकता?

किसानों की आत्महत्या एक बड़ा ही गंभीर एवं संवेदनशील मुद्दा है। ऐसे में विशेषज्ञों की सलाह है कि नीति निर्माताओं को इस बारे में शीघ्र ही कुछ स्पष्ट कदम उठाने चाहिए।

  • सरकारी तंत्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि जो अवैध कर्ज दाता सक्रिय हैं उन पर लगाम लगे।
  • छोटे एवं मझोले किसानों को ध्यान में रखते हुए कृषि कल्याण के संबंध में प्रभावी कदम उठाया जाना चाहिए, ताकि किसानों को कर्ज की जरूरत ही ना पड़े।
  • फसल बर्बाद होने जैसी परिस्थितियों से बचने के लिए बीमा जैसे उपायों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • लोन की वैध प्रक्रिया को सुगम बनाना होगा। साथ ही इसकी शर्तों को कुछ इस तरह से बनाना होगा कि किसानों को भी राहत मिले और बैंक भी सुचारु रुप से चलते रहें।
  • लोन से जुड़े किसी भी तरह के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने से पहले किसानों को उसको ठीक तरह से जांच लेना चाहिए। जो अधिकृत कर्जदाता है उन्हीं से ही लोन लेना चाहिए।