आर. वेंकट-रमणि : भारत के नए अटॉर्नी जनरल (R. Venkata-Ramani : New Attorney General of India) : डेली करेंट अफेयर्स

वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता आर. वेंकट-रमणि भारत के नए अटॉर्नी जनरल बनाए गए हैं। विधि और न्‍याय मंत्रालय की अधिसूचना में कहा है कि राष्‍ट्रपति ने श्री वेंकट-रमणि को तीन वर्ष की अवधि के लिए नया अटॉर्नी जनरल नियुक्‍त किया है। वे अटॉनी जनरल के के वेणुगोपाल का स्थान लेंगे जिनका कार्यकाल 30 सितम्बर को समाप्त हो रहा है। इससे पहले कयास लगाए जा रहे थे कि वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी भारत के अगले महान्यायवादी (अटॉर्नी जनरल) होंगे। हालांकि इस अधिसूचना के बाद तस्वीर पूरी तरह से स्पष्ट हो गई।

बताए दें कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 76 में भारत के महान्यायवादी के पद का प्रावधान किया गया है। यह देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी और केंद्रीय कार्यपालिका का एक अंग होता है। साधारण भाषा में कहें तो यह अदालत में भारत सरकार का केस लड़ने का काम करता है। अटॉर्नी जनरल को नियुक्त करने का काम मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। महान्यायवादी के तौर पर नियुक्त होने के लिए व्यक्ति को कुछ योग्यता रखनी होती है जैसे कि वो सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के योग्य हो, यानी वह भारत का नागरिक हो; उसे हाईकोर्ट के जज के रूप में काम करने का पाँच सालों का अनुभव हो या किसी हाईकोर्ट में वकालत का 10 सालों का अनुभव हो या फिर राष्ट्रपति के विचार में वो क़ानूनी मामलों का जानकार हो।

संविधान द्वारा अटॉर्नी जनरल का कोई कार्यकाल नहीं तय किया गया है। यह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत यानी जब तक राष्ट्रपति चाहेगा तब तक महान्यायवादी अपने पद पर बना रहेगा। महान्यायवादी को हटाने की ना ही कोई प्रक्रिया संविधान में बताई गई है और ना ही कोई इसका आधार बताया गया है।

जैसे कि मैंने पहले ही बताया कि महान्यायवादी भारत सरकार का सबसे बड़ा सरकारी वकील होता है। ऐसे में इसका सबसे प्रमुख काम होता है भारत सरकार से संबंधित सभी मामलों में सर्वोच्च न्यायालय या किसी भी उच्च न्यायालय में भारत सरकार का पक्ष रखना। इसके अलावा भी इसके कई अन्य महत्वपूर्ण कार्य होते हैं जैसे कि यह राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए सभी कानूनी मामलों में भारत सरकार को सलाह देता है और कानूनी रूप से ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करता है जो उसे राष्ट्रपति द्वारा सौंपे जाते हैं। गौरतलब है कि अनुच्छेद 143 के मुताबिक राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श ले सकता है। इस प्रक्रिया में महान्यायवादी भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही, महान्यायवादी को संविधान या किसी अन्य कानून द्वारा जो भी काम मिलता है उसका भी निर्वहन करता है।

अटॉर्नी जनरल भारत सरकार में का एक ऐसा अधिकारी होता है जो संसद के दोनों सदनों या फिर उनकी संयुक्त बैठक में भाग ले सकता है और वहां पर अपनी बात रख सकता है। हालांकि उसे संसद में वोट देने का अधिकार नहीं होता है। इसके अलावा वह संसद की किसी भी ऐसे समिति का जिसका कि वह सदस्य नामित किया गया हो उसकी कार्यवाही में बोलने तथा भाग लेने का अधिकारी होता है। एक सांसद को जो कुछ भी विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ मिली हुई होती हैं वह अटॉर्नी जनरल को भी मिलता है। यहां एक बात ध्यान देने लायक है कि चूँकि महान्यायवादी पूरी तरह से सरकारी सेवकों की श्रेणी में नहीं आता है इसलिए वह अपनी वकालत वाली निजी प्रैक्टिस भी कर सकता है, लेकिन उसे इस बात का ध्यान रखना होता है कि वह सरकार के ही खिलाफ केस नहीं लड़ सकता। इसके पीछे तर्क यह है कि वह सरकार का ही पक्षकार होता है और सरकार के खिलाफ केस कैसे लड़ सकता है। अटॉर्नी जनरल के काम में सहयोग करने के लिए वकीलों की पूरी एक टीम होती है जिसमें इसके नीचे भारत के सॉलिसिटर जनरल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल जैसे विधि अधिकारी काम करते हैं।

गौरतलब है कि जिस तरह केंद्र सरकार के लिए महान्यायवादी होता है उसी तरह से राज्य सरकार के लिए महाधिवक्ता होता है। इसका जिक्र संविधान के अनुच्छेद 165 में किया गया है और इसके नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। इस तरह हर राज्य का अपना एक महाधिवक्ता होता है।