प्रोजेक्ट चीता (Project Cheetah) : डेली करेंट अफेयर्स

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 17 सितम्बर को मध्यप्रदेश में श्योपुर जिले के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में आठ चीतों को प्राकृतिक वास में छोडा। ये चीते नामीबिया से लाये गए हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान ने चीता पुनर्वास की संभावनाओं का पता लगाने के लिए देश के दस स्थानों के सर्वेक्षण के बाद मध्यप्रदेश में कूनो राष्ट्रीय उद्यान को उपयुक्त स्थान पाया। 750 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला यह राष्ट्रीय उद्यान करीब दो दर्जन से अधिक चीतों के प्राकृतिक वास में रहने का उपयुक्त स्थान है। इसके अलावा श्योपुर और शिवपुरी जिलों में लगभग तीन हजार वर्ग किलोमीटर जंगल का इलाका है, जिसमें चीते खुले में घूम फिर सकेंगे। इसके साथ ही विश्व की पहली चीता पुनर्वास परियोजना की शुरूआत की गई।

क्या है प्रोजेक्ट चीता?

‘प्रोजेक्ट चीता’ एक राष्ट्रीय परियोजना है, जिसमें राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और मध्य प्रदेश सरकार शामिल हैं। इस परियोजना के तहत चीतों को उनके मूलस्थान नामीबिया-दक्षिण अफ्रीका से हवाई रास्ते से भारत लाना और उन्हें मध्य प्रदेश (एमपी) के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में बसाया जाना है। भारत का चीता प्रोजेक्ट विश्व का पहला ऐसा प्रोजेक्ट है, जहां एक बड़े मांसाहारी जीव को किसी दूसरे महाद्वीप में बसाने की कोशिश हो रही है। फरवरी 2022 में सरकार ने लोकसभा में जानकारी दी थी कि चीता प्रोजेक्ट के लिए 2021-22 से 2025-26 तक के लिए 38.70 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है।

भारत में दूसरे महाद्वीप से चीते लाने की जरूरत क्यों पड़ी?

एक समय था जब भारत में चीतों की पर्याप्त संख्या हुआ करती थी, लेकिन जंगलों की बेतहाशा कटाई यानी उनके पर्यावास का नष्ट होना और चीतों का असीमित मात्रा में शिकार करना … यह दोनों ऐसे कारण है कि भारत में चीता विलुप्त हो गए। बताया जाता है कि मध्य प्रदेश में कोरिया के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह देव ने अपने रियासत के रामगढ़ इलाके में दिसंबर 1947 में देश में अंतिम तीन चीतों को मार डाला था। इसके बाद साल 1952 में भारत सरकार ने चीतों को विलुप्त घोषित कर दिया। एक्सपर्ट्स के मुताबिक चीते पारिस्थितिक तंत्र के लिए बेहद जरूरी है। दरअसल ये अंब्रेला प्रजाति का जीव है यानी ये फूड चेन में सबसे ऊपर मौजूद जीव होता है। इसके न होने से फूड चेन का संतुलन पूरी तरह से बिगड़ रहा है। इसीलिए एक बार फिर से इन चीतों को भारत में बसाने की कोशिश की जा रही है।

अफ्रीकी प्रजाति के चीते ही क्यों लाए जा रहे हैं भारत?

एक बार ऐसा था कि भारत की बात ईरान के साथ चल रही थी कि ईरान उसे चीते उपलब्ध कराएगा, लेकिन तमाम वजहों से यह बात बन नहीं पाई। बाद में नामीबिया किस बात के लिए तैयार हो गया कि वह भारत को चीते उपलब्ध कराएगा। इसके दो बड़े कारण है - पहला यह कि ये देश बिना किसी लागत के भारत को चीते देने को तैयार हैं और दूसरा यह कि अफ्रीकी नस्ल के चीते भारत की जलवायु के अनुकूल हैं।

कूनो नेशनल पार्क कहाँ है और यहीं पर ही क्यों लाए जा रहे चीते?

कूनो-पालपुर वन्यजीव अभयारण्य को वर्ष 2018 में एक राष्ट्रीय उद्यान के रूप में घोषित किया गया था। मध्य प्रदेश के चंबल क्षेत्र में स्थित, कुनो-पालपुर राष्ट्रीय उद्यान 750 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। वर्तमान में इसमें तेंदुए, सियार, चित्तीदार हिरण, सांभर, नीलगाय, चिंकारा, जंगली सूअर और चार सींग वाले मृग हैं। अफ़्रीकी चीतों को भारत में बसाने के लिए 2010 और 2012 के बीच मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में दस साइट्स का सर्वेक्षण किया गया। बाद में यह पाया गया कि मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में बना कूनो राष्ट्रीय उद्यान ही चीतों के लिए सबसे सही और सुरक्षित जगह है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान और भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट (WTI) के मुताबिक यहां का वातावरण चीतों के अनुकूल है जैसे कि यहां घने जंगल हैं, घास के मैदान हैं, पर्याप्त पानी है और पहाड़ियां भी हैं। चीते छोटे हिरण और सुअर के शिकार पर जिंदा रहते हैं, जिनकी संख्या कूनो नेशनल पार्क में काफी ज्यादा है। कूनो नेशनल पार्क में 20 से 25 हजार चीतल, नीलगाय, सांभर, चौसिंघा और चिंकारा हैं। इसके अलावा मोर जैसे पक्षी भी काफी संख्या में कूनो नेशनल पार्क में हैं जो चीतों के लिए आसान शिकार हैं। कूनो नेशनल पार्क के बीच से कूनो नदी बहती है जिससे यहां कभी पानी का संकट नहीं होगा। इस तरह जलवायु चर, शिकार घनत्व, प्रतिस्पर्धी शिकारियों की आबादी और ऐतिहासिक सीमा के आधार पर कूनो नेशनल पार्क चीतों के लिए सबसे सही स्थान माना गया। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कूनो नेशनल पार्क में 21 चीतों के रहने की जगह है। अगर सही मैनेजमेंट किया जाए तो यहां पर 36 चीते रह सकते हैं और पूरे आनंद के साथ शिकार कर सकते हैं।

इससे क्या फायदा होगा?

चीतों के विलुप्त होने से भारतीय ग्रासलैंड की इकोलॉजी खराब हुई थी जिसे ठीक करना जरूरी है। चीतों के आगमन के बाद बिगड़ी हुई इकोलॉजी के ठीक होने की शुरुआत हो जाएगी। इस प्रोजेक्ट के सफल होने पर भारत में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। पर्यटकों के आने से स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेगा। साथ ही यहां के सवाना जंगलों को संरक्षित किया जा सकेगा। दूसरे वन्यजीवों को भी साथ में संरक्षण मिलेगा।

आगे क्या चुनौतियाँ हो सकती हैं?

प्रोजेक्ट चीता को लेकर कुछ चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती अफ्रीकी चीतों के भारत के पर्यावरण से से तालमेल बनाने की है। इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि छोटे-छोटे रिजर्व एरिया में गहरी निगरानी में रहने के बजाय ये चीते आने वाले वर्षों में किस तरह एक से दूसरे इलाकों में खुद आ-जा सकेंगे और इनके छोटे-छोटे समूह आपस में किस तरह घुल-मिल सकेंगे। प्रजनन बढ़ाने के लिहाज से ऐसा संपर्क बेहद अहम होता है। अगर इंसानी दखलंदाजी बहुत ज्यादा हो गई तो अफ्रीक्री चीतों के लिए कूनो नैशनल पार्क प्राकृतिक पर्यावास के बजाय चिड़ियाघर की तरह हो जायेगा।