भारत की पहली सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले एफएबी विनिर्माण इकाई : डेली करेंट अफेयर्स

प्रमुख कारोबारी समूह वेदांता और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र की दिग्गज कंपनी फॉक्सकॉन ने हाल ही में गुजरात सरकार के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। इन दोनों कंपनियों ने राज्य में सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले एफएबी विनिर्माण इकाई लगाने के लिए यह समझौता किया है। सेमीकंडक्टर फैब एक मैन्युफैक्चरिंग प्लांट होता है जिसमें कच्चे सिलिकॉन वेफर्स (सिलिकॉन की पट्टी) को इंटीग्रेटेड सर्किट में बदला जाता है। तो ... इस करार के तहत दोनों कंपनियां गुजरात में संयंत्र लगाने पर 1,54,000 करोड़ रुपये का निवेश करेंगी। इस संयुक्त उद्यम में वेदांता की 60 फीसदी हिस्सेदारी होगी, जबकि फॉक्सकॉन की 40 फीसदी हिस्सेदारी होगी, जो भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक इकोसिस्टम बनाने का काम करेगा।

देश मे वहनीय सेमीकंडक्टर तथा ...

क्या होता है सेमीकंडक्टर?

सेमीकंडक्टर चिप्स सिलिकॉन से बने होते हैं और किसी भी विद्युत सर्किट में इलेक्ट्रिसिटी नियंत्रित करने के काम आते हैं। यह न ही विद्युत के पूरी तरह से कुचालक होते हैं और न ही पूरी तरीके से सुचालक। दूसरे शब्दों में कहें तो यह इलेक्ट्रॉनिक सामानों को ऑटोमेटिक तौर पर चलाने में मदद करती हैं। उदाहरण के तौर पर, स्मार्ट वॉशिंग मशीन में कपड़े पूरी तरह धुल जाने के बाद मशीन अपने आप बंद हो जाती है। कंप्यूटर, लैपटॉप, कार, वॉशिंग मशीन, ATM और अस्पतालों की मशीन से लेकर हाथ में मौजूद स्मार्टफोन तक यह सभी सेमीकंडक्टर की मदद से ही काम करते हैं। जैसे हम इंसानों में हमारा खुद का दिमाग होता है उसी तरह सेमीकंडक्टर को इन मशीनों का दिमाग कहा जा सकता है।

पिछले साल कमी क्यों आ गई थी?

दरअसल कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन के बाद से दुनियाभर में सेमीकंडक्टर चिप्स की कमी शुरू हो गई थी। हुआ यूं कि लॉकडाउन की वजह से सामानों और उत्पादों की मांग में कमी आ गई। इसके कारण चिप्स का उत्पादन भी कम होने लगा। जैसे ही लॉकडाउन खुला तो इलेक्ट्रॉनिक सामानों की मांग अचानक से बढ़ गई। अचानक से बढ़ी इस मांग की वजह से मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ गया। इसका परिणाम यह हुआ कि बाजार में सेमीकंडक्टर चिप्स की कमी आ गई।

इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाया था?

इसी समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार ने देश में ही सेमीकंडक्टर चिप निर्माण को बढ़ावा देने के मकसद से 76 हजार करोड़ रुपए की महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी दी थी। इस योजना के तहत 6 साल में देश में सेमीकंडक्टर चिप निर्माण के लिए एक वातावरण तैयार किया जाना है। इसमें सेमीकंडक्टर डिजाइन, इसके पार्ट्स के निर्माण की यूनिट्स और डिस्प्ले फैब्रिकेशन यूनिट्स की स्थापना की जानी है। सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले फैब्रिकेशन यूनिट कंपनियों को 50% तक आर्थिक सहायता दिए जाने की बात कही गई है। सरकार के मुताबिक अगले 5 से 6 साल में देश में 100 से ज्यादा सेमीकंडक्टर डिजाइन, कॉम्पोनेंट मैन्युफैक्चरिंग और डिस्प्ले फैब्रिकेशन यूनिट्स की स्थापना की जानी है। इन्ही प्रयासों के क्रम में ये हालिया समझौता किया गया है। इस प्रोजेक्ट को अपने-अपने राज्य में ले जाने के लिए कई राज्य की सरकारें लगी हुई थीं। इस रेस में महाराष्ट्र सबसे आगे था, लेकिन बाद में ये प्रोजेक्ट गुजरात में फाइनलाइज़ किया गया।

इस मौजूदा अग्रीमेंट के क्या फायदे हैं?

मौजूदा समझौता भारत की सेमीकंडक्टर विनिर्माण महत्वाकांक्षा को गति देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कुल 1.54 लाख करोड़ रुपये का निवेश अर्थव्यवस्था और नौकरियों को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण है। गुजरात सरकार के मुताबिक इससे एक लाख प्रत्यक्ष रोजगार के अवसरों का सृजन होगा। दुनिया में इस्तेमाल होने वाले सभी चिप का आठ प्रतिशत ताइवान में बनता है। इसके बाद चीन और जापान का नंबर आता है। लेकिन अब इस आगामी प्लांट से भारत में सेमीकंडक्टर चिप निर्माण की शुरुआत होगी। यह भारत के लिए रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे अन्य देशों पर हमारी निर्भरता कम होगी। साथ ही यह सहायक उद्योगों के लिए एक बड़ा पारिस्थितिकी तंत्र भी बनाएगा और हमारे उद्योगों की मदद भी करेगा।

आगे क्या किया जा सकता है?

सेमीकंडक्टर चिप्स को घरेलू स्तर पर बनाने की कोशिश पहले भी हो चुकी है, लेकिन खराब प्लानिंग की वजह से यह कोशिश इच्छित परिणाम नहीं दे पाई थी। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए इन नई कोशिशों को बेहतर तरीके से क्रियान्वित करना होगा।