संवैधानिक राजतंत्र (Constitutional Monarchy) : डेली करेंट अफेयर्स

बीते 8 सितंबर को महारानी एलिजाबेथ द्वितीय का निधन के बाद उनके बड़े बेटे चार्ल्स ब्रिटेन के नए राजा बन गए हैं। 72 वर्षीय चार्ल्स ब्रिटेन की गद्दी संभालने वाले सबसे उम्रदराज शासक हैं। ब्रिटेन की किंगशिप के अलावा उनके पास दर्जनभर से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्ष की जिम्मेदारी भी है। हालांकि, उनकी आधिकारिक रूप से ताजपोशी 2023 में हो सकती है।

दुनिया भर में अलग-अलग देशों में तमाम तरह की शासन प्रणालियां मौजूद हैं। इनमें पूर्ण अध्यक्षीय प्रणाली वाले देश, अर्ध-अध्यक्षीय प्रणाली वाले देश, संसदीय गणराज्य, नाममात्र के राष्ट्राध्यक्ष वाले संसदीय गणराज्य, संवैधानिक राजतंत्र, अर्ध-संवैधानिक राजतंत्र, पूर्ण राजतंत्र और एक-दलीय राज्य आदि शामिल हैं। इसके अलावा कुछ ऐसे भी देश है जहां की शासन प्रणाली की स्थिति थोड़ी सी अस्पष्ट है यानी वहां पर अनंतिम सरकार अथवा पूर्णतः अलग शासन प्रणाली है। यहां पर हम केवल संवैधानिक राजतंत्र की बात करेंगे जो कि ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था है।

संवैधानिक राजतंत्र को जानने से पहले हम राजतंत्र क्या होता है यह जान लेते हैं। राजतंत्र एक प्रकार का शासन होता है, जहाँ लीडर या शासक, एक विशेष परिवार से ही पीढ़ी दर पीढ़ी चुना जाता है। इसमें ये जनता द्वारा नहीं चुना गया रहता है। देश का प्रमुख, जो सिंहासन पर बैठता है, उसे सम्राट या राजा के रूप में जाना जाता है और जिस तरीके से राजा चुना जाता है और शासन चलाया जाता है उसे राजशाही कहा जाता है। इसमें राजा का वचन ही शासन होता है ..... नियम क़ानून जनता नहीं बल्कि राजा तय करता है।

अब बात करते हैं संवैधानिक राजतंत्र की …. संवैधानिक राजतंत्र किसी राज्य की उस शासन-प्रणाली को कहते हैं जिसमें सर्वोच्च शासक तो राजा होता है लेकिन उसकी शक्तियाँ किसी संविधान या क़ानून द्वारा सीमित होती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि वह राजा अपनी मनमानी से राज नहीं कर सकता। राजा उस देश के लिखित या अलिखित कानून से बंधा होता है। ब्रिटेन और जापान में ऐसी ही संवैधानिक राजतंत्र वाली व्यवस्था है। इस तरह के ज्यादातर देशों में सत्ता या राजनीति की असली ताकत जनता द्वारा चुनी हुई संसद में निहित होती है। यही कारण है कि कभी-कभी इन्हें संसदीय राजतंत्र भी कहा जाता है।

ब्रिटेन की इस राजशाही के कुछ संवैधानिक कर्तव्य होते हैं जैसे यहां का किंग क्वीन जनता द्वारा चुनी गई सरकार को मंजूरी देती है। ब्रिटेन का राजा औपचारिक रूप से संवैधानिक प्रणाली से चुने गए प्रधानमंत्री को नियुक्त करता है। इसके लिए चुनाव जीतने वाली पार्टी के प्रमुख को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है। इसके साथ ही किंग या क्वीन कुछ निश्चित अधिकारियों की नियुक्ति करता है या उन्हें स्टेट ऑनर देता है। इसके अलावा स्टेट ओपनिंग या संसदीय वर्ष की शुरुआत के समय किंग का संबोधन होता है। संसद के जरिए कानून पारित होने पर उस पर औपचारिक मुहर लगाने का काम भी किंग या क्वीन का होता है। हालांकि, कुछ असामान्य परिस्थितियों में किंग के पास कुछ आरक्षित शक्तियां होती हैं, जिसके तहत वह एकतरफा रूप से चुनी गई सरकार को बर्खास्त कर सकता है। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ऐसा रेयर ही देखने को मिला है।

आप लोग अक्सर सुनते होंगे कि भारत की संसदीय व्यवस्था ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था की ही एक कॉपी है। लेकिन भारतीय संसदीय व्यवस्था और ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था में कुछ मूलभूत अंतराल है। उदाहरण के तौर पर ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था में ब्रिटिश राजशाही के स्थान पर भारत में गणतंत्रीय पद्धति को अपनाया गया है यानी ब्रिटेन में राज्य का प्रमुख आनुवंशिक आधार पर बनता है, जबकि भारत में राज्य का प्रमुख जनता द्वारा चुना गया होता है जो कि राष्ट्रपति होता है। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था संसद की संप्रभुता के सिद्धांत पर आधारित है, जबकि भारत में संसद सर्वोच्च नहीं है। यहाँ लिखित संविधान, संघीय व्यवस्था और न्यायिक समीक्षा आदि के प्रावधान किए गए हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के लिए यह अनिवार्य है कि उसे निचले सदन यानी हाउस ऑफ कॉमंस का सदस्य होना होगा जबकि भारत का प्रधानमंत्री दोनों सदनों में से किसी एक का सदस्य हो सकता है। इसके अलावा आमतौर पर ब्रिटेन में संसद के सदस्य ही मंत्री नियुक्त किए जाते हैं जबकि भारत में कोई ऐसा व्यक्ति भी मंत्री बन सकता है जो संसद का सदस्य नहीं है। हालांकि ऐसा व्यक्ति सिर्फ 6 महीने के लिए ही मंत्री बन सकता है।